May 21, 2012

दो कविताएँ


1.
मैं ही
सही हूँ
शेष सब गलत हैं
ऐसा तो
सभी सोचते हैं
लेकिन ऐसा सोचने वाले
कुछ लोग
अनुभव करते हैं
अतिशय दुख का
क्योंकि
शेष सब लोग
लगे हुए हैं
सही को गलत
और गलत को सही
सिद्ध करने में

2.
मुझे
एक अजीब-सा
सपना आया
मैंने देखा
एक जगह
भ्रष्टाचार की
चिता जल रही थी
लोग खुश थे
हँस-गा रहे थे
अमीर-गरीब
गले मिल रहे थे
सभी एक-दूसरे से
राम-राम कह रहे थे
बगल में
छुरी भी नहीं थी

सपने
सच हों या न हों
पर कितने अजीब होते हैं
है न ?



                                                        -महेन्द्र वर्मा

28 comments:

मनोज कुमार said...

दोनों कविताएं मन को झकझोरती हैं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दोनों रचनाएँ बहुत सुंदर ... सपना तो सच ही अजीब देखा ...भला कहीं ऐसा होता है

dheerendra said...

सपने
सच हों या न हों
पर कितने अजीब होते हैं
है न

बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

RECENT POST काव्यान्जलि ...: किताबें,कुछ कहना चाहती है,....

Anupama Tripathi said...

आपकी कविताओं के भाव गहन होते हैं ...!!
यहाँ भी एक टीस उभर रही है ...जो मन उद्वेलित कर रही है ...!!
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...!!
शुभकामनायें ...!!

रविकर फैजाबादी said...

आमंत्रित सादर करे, मित्रों चर्चा मंच |

करे निवेदन आपसे, समय दीजिये रंच ||

--

बुधवारीय चर्चा मंच |

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से आभार।

Ramakant Singh said...

सपने अपने ही होते हैं ,भाव पूर्ण कविताएँ .दिल में उतरनेवाली दिल के करीब ........

expression said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति.....

काश आपका स्वप्न सच हो जाये........

सादर.

Pallavi said...

काश........ और कोई हो न मगर आपका यह सपना सच हो जाये तो कितना अच्छा हो....

ashish said...

सपने सच हो ऐसी दुआ है . उम्मीद का दिया जलता रहे . सुँदर रचना .

Asha Saxena said...

दोनो कवितायेँ सोचने पर विवश करती हैं |अच्छी प्रस्तुति |
आशा

दिगम्बर नासवा said...

वाह .. क्या कहने .. सपने सच में अजीब होते हैं जो ये सब दिखाते हैं और हम मजबूरी में देखते भी हैं ...

वन्दना said...

दोनो ही कविताये गहन सोच को दर्शाती हैं।

M VERMA said...

१. इसीलिये सही और गलत के गणित को जानना जरूरी है
२. सपना ही था ये तो .. और फिर अजीब भी तो है

Chirag Joshi said...

bahut kuch kah gai aapki ye 2 kavitaye
Thanks
http://drivingwithpen.blogspot.in/

सदा said...

गहन भाव लिए ..उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

Bharat Bhushan said...

पहली कविता दुनिया के सारे कारोबार को दो पंक्तियों में कह जाती है और दूसरी कविता कभी सच न होने वाले सत्य का अंतर्विरोध है. वाह महेंद्र जी. पहली कविता चौंका गई और दूसरी जला गई.

UMA SHANKER MISHRA said...

बहुत हि कम शब्दों में आपने बहुत कुछ कह दिया|
वाह शाश्वत शिल्प वाह धन्यवाद महेंद्र जी

Maheshwari kaneri said...

दोनों रचनाएँ बहुत सुंदर ...अच्छी प्रस्तुति,,,,

veerubhai said...

महेंद्र वर्मा जी ,ये बिलकुल फ़िज़ूल सपना है .और गर ये सच भी हो जाए तो भाई साहब यहाँ तो हम शक्ल (clone )बना लिए गएँ हैं .भ्रष्टाचार के कुनबे के .ऐसे सपने न देखा करें आर्थिक वृद्धि रुक जायेगी .देश खड़ा हो जाएगा .कृपया यहाँ भी पधारें -
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ये है बोम्बे मेरी जान (अंतिम भाग )
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Kunwar Kusumesh said...

गहन भाव / उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति.

रविकर फैजाबादी said...

आप ने आकर बुधवारीय चर्चा मंच की शोभा बधाई ।

आभार ।।

Kailash Sharma said...

दोनों रचनायें बहुत सार्थक और सुन्दर...आभार

संजय भास्कर said...

दोनों रचनाएँ बहुत सुंदर...अच्छी प्रस्तुति

संजय भास्कर said...

मन खुश हो गया पढ़ कर

Suman said...

दोनों रचनाएँ सुंदर लगी ....

यादें....ashok saluja . said...

आप की दोनों रचनाएँ ...बहुत कुछ समझा रही हैं .
आभार!

ZEAL said...

मन में उठते भावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति।